Monday, July 3, 2017

"A happy couple is a myth"

It is a symbolic story of modern days couples who see their relationship with their own perspectives and do not consider their partner's side of mirror. ------
सुबह सात बजते ही हमारे जैसे आम आदमी अपनी दिनचर्या से लड़ते-झगड़ते, लंच और ब्रेकफास्ट की खींचातानी के साथ साथ घर-गृहस्ती की उलझनों को सुलझाते हुए अपने- अपने ऑफिस की तरफ ऐसे दौड़ लगाते हैं मानो अगर आज ना पहुँचे तो हमारी माशूका का बाप उसकी सगाई किसी बड़े डाक्टर, इंजीनियर से कर देगा!
और सच भी है भई आजकल नौकरी किसी माशूका से कम भी तो नहीं! किसी दिन टाईम पे आई लव यू नहीं बोला और ज़रा सी लापरवाही हुई नहीं कि नया ब्वायफ़्रेंड ढूंढ लिया जाता है।ऐसे में किसी दिन घर की मालकिन बीमार पर जाए तो समझो अपनी माशूका नौकरी को बचाये या बीवी को भाई ये तय करना बड़ा कठिन हो जाता है । पर फिर भी ब्याहता बीवी ज्यादा कीमती होती है साहब ! आखिर घर की इज्जत प्रतिष्ठा को ही सही और फिर समाज में खुद को फेमिनिस्ट दिखाना भी तो पड़ता है ! ऐसे में पति महोदय ऑफिस रूपी माशूका को छोड़ पत्नी पर ज्यादा फोकस करना ही अपना धर्म मानने लगते हैं! अमूमन आजकल के मर्द हमारे पापा और चचा लोगों के जमाने की तरह पूरे अड़ियल मर्द नहीं होते शायद उन्हें थोड़ा फेमिनिस्ट होना तथाकथित आधुनिकता का प्रमाण लगता है।और एक हमारे पिताजी लोगों का भी ज़माना हुआ करता था ! भई मजाल है जो माँ की तबियत खराब हो और आकर अंदर झाँक जाएं। उस जमाने में पत्नी की तीमारदारी करना जोड़ू का गुलाम टाईप तमगा दे जाता था। इस डर से लोग अपनी पत्नी को अपनी माँ और भाभियों के हवाले कर बाहर निकल जाया करते थे। पर हाय रे मरी किस्मत आजकल तो मियां बीवी दोनों ही घर से दूर नौकरी पर जाते हैं तो अब ऐसे में कौन मर्द बने और कौन औरत ये बड़ी विकट समस्या हो जाती है। अतः मज़बूरी में भारत के पचास फीसदी मर्दों ने आधुनिक बनने का फैसला ले लिया और बाँकी पचास फीसदी मर्द अन्य पुरुषों को देख कर आधुनिक होने का शौक पाल रहे हैं! अब पता है हमारी बात ऑफेंस क्रिएट करेगी और गालियाँ तो पड़नी हैं ही फिर भी आज अपने दोस्त अतुल की कहानी सुना कर ही रहेंगे आपको। दरअसल अतुल और उसकी पत्नी सोना हमारी फैमिली फ्रेंड हैं और दोनों से अक्सर बात होती रहती है तो ऐसे में दोनों का पक्ष रखने से शायद पाठकों को यह कहानी ज्यादा न्यायपूर्ण लगे।
तो भाई अतुल हमारे वो दूसरे वर्ग के पुरुष हैं जिन्हें वैसे तो आधुनिकता ख़ास पसंद नहीं पर समाज का रुख देखते हुए खुद को आधुनिक बनाने की होड़ में लगे रहते हैं। अतुल जैसे लोग जीन्स और शॉर्ट्स वाली पत्नी चाहते तो हैं मगर बंद कमरों में! बाहर बेचारे बड़ा केयरिंग सा बर्ताव कर-कर के पत्नी के खुले-खुले अंगों को भिन्न- भिन्न बहानों से किसी तरह ढँकने का प्रयास करते रहते हैं। उन्हें पसंद आता है अगर उनकी पत्नी घर-बाहर सब संभाल ले पर किचन और बच्चों की जिम्मेदारी लेना उन्हें औरतों का काम लगता है। अब इसके लिए उनके पास अपने तरीके भी हैं जो स्त्री की महानता को दर्शाते हुए बिना ऑफेंस समाज में खुद को बेहतर पति और बेहतर पिता दिखाने के लिए पर्याप्त हैं और ये भी एक कला ही है।
दूसरी तरफ,अतुल की पत्नी सोना एक अलग ही किरदार है। वो समझ ही नहीं पाती की उसे अपने पति के साथ मॉडर्न होना है या ओल्ड फैशन्ड । आजकल की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में उसे सच और कल्पना के बीच तालमेल बिठाना आता ही नहीं जो उसके अपने जीेवन के लिए तो अत्यंत हानिकारक है ही पर अवश्य ही ये स्वभाव अतुल को भी परेशान रखेगा। हालाँकि,गलती दोनों में से किसी की भी नहीं क्योंकि हमारा समाज हमें पाल ही ऐसे रहा है । जहाँ लड़की को मॉडर्न होना नौकरी करना सिखाया तो जाता है पर साथ साथ रात को घर से बाहर निकलने से मना भी किया जाता है। जहां शादी के बाद घर और औफिस दोनों की जिम्मेदारी उठाना लड़कियों का कर्तव्य हो जाता है। जहां ये उम्मीद की जाती है कि महिलाएं नौकरी में पति के बराबर तो हों पर घर के कामकाज भी जानती हों। और सबसे अहम् तो यह कि कारपोरेट नौकरियों में मर्द शराब -सिगरेट पियें तो चलता है लेकिन उसी जगह काम करने वाली महिलाओं का शराब पीना लोगों को आश्वस्त करता है कि महिला सीधी नहीं है अर्थात सरलता से "सेट" हो जाएगी। और फिर इस का विरोध करने पर एक ही जवाब दिया जाता है कि , "भाई औरतें मर्द की तरह नहीं हो सकतीं क्योंकि घर की इज्जत उनके साथ चलती। मर्दों को इज्जत का खतरा नहीं होता। ऐसे में औरतों को सावधानी रखनी चाहिए।" मैं इस तर्क से सहमत भी हूँ पर अगर इज्जत का इतना ही डर है फिर नौकरी पेशा पत्नी, बहू या बेटी क्यों? क्यों कोई गाँव की कम पढ़ी-लिखी लड़की से अपने शहरी बेटे की शादी नहीं करता? और क्यों नहीं बेटों को सिखाता कि रात को बाहर निकलने वाली औरतें तभी सुखी रहेंगी जब तुम उन्हें माँ , बहन या दोस्त समझो कोई वैश्या नहीं। भई कोई भी औरत अपने सम्मान की कीमत पर आजादी तो कतई नहीं चाहती पर सबकी अपनी -अपनी मजबूरियाँ होतीं हैं। समझ ही नहीं आता कि समाज महिलाओं को क्या बनाना चाहता है ? आधा मर्द या आधी औरत? खैर इस मुद्दे पर बहस फिर कभी की जाएगी। फिलहाल चलते हैं अतुल के घर जहाँ बाई ने अभी अभी डोर बेल बजाई है।
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सोना। सोना ओफ्फो, सोना ......! बाबू देखो ना डोर बेल बज रही है। सोना प्लीज उठ के दरवाजा खोलो यार। पर सोना का जवाब नहीं मिलने पर हार के अतुल खुद ही उठ के दरवाजा खोलने चला गया। सोना के सर पर हाथ फेरते हुए अतुल ने पूछा, "क्या हुआ बाबू उठ क्यों नहीं रही ? तबियत खराब है क्या?
आधे होश में सोना बोली "अतुल ! आप प्लीज छुट्टी ले लो, मेरी तबियत बहुत खराब है। आई थिंक इट्स वाइरल फ़ीवर। फीलिंग सो हैवी। ज़रा पानी की बॉटल दिजिएगा।"
"हाँ श्योर बेबी। ये लो! मैं अभी मैनेजर को बोलता हूँ पर साला मान जाए तब ना । छुट्टी का नाम लेते ही साले की.... "उफ अतुल प्लीज! कभी बिना गाली के भी काम कर लिया करिये। "या बेबी सौरी सौरी,आई फॉरगॉट, नो गाली हाँ। अभी मैनेजर साब से बात करके अवकाश मांग लूँ? अतुल के क्यूट बिहेवियर से सोना के बीमार चहरे पे भी हँसी की रेखा खिंच गई। हालाँकि सोना जानती थी कि अतुल का घर पे रुकना उसके लिए मेन्टल शॉक ही लाएगा पर फिर भी बिमारी में किसी अपने का साथ अच्छा लगता है और पति हो या पत्नी दोनों ही चाहते हैं कि अगला उनकी परवाह करे उन्हे बिना शर्त प्यार करे। पर हमारे अतुल बाबू बड़े ही निराले कोटि के पति हैं। उनका अंदाज-ए-मोहब्बत ज़रा हट के है। तो मुद्दे की बात ये है कि पति महोदय ने बीवी की कठिन बिमारी का हाल बयां कर अपने ऑफिस से छुट्टी ले ही ली क्योंकि खड़ूस मैनेजर भी जानता है कि बीवी की जरूरतों को दरकिनार करने की हिम्मत तो भगवान नारायण भी नहीं कर सकते।
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अभी आधे घंटे भी नहीं हुए और बाई बड़बड़ाते हुए अंदर आई "मैडम, भईया को बोलो मेरे काम में दखल दे रहे हैं बेफ़िजूल में। काम करने ही नहीं देते।बड़ी मुश्किल से आँख खोल कर सोना ने पूछा, "क्या हुआ अतुल ?क्यों चिढ़ रही है मेड? क्या कहा आपने इससे? "अरे मैं क्या कहूँगा यार ? ये देखो ठीक से साफ़- सफाई नहीं कर रही बहुत सर चढ़ा रखा है तुमने इसे। अच्छा भाई बाद में बहस कर सकते क्या? एम् रिअली फीलिंग बैड। तुम जाओ सरिता काम करो अपना। "अच्छा लाओ तुम्हारा फीवर चेक करूँ? "आई हैव चेक्ड। अभी 103 है , मैं पैरासिटामोल की टैबलेट ले लेती हूँ। "हाँ ठीक है। वैसे क्या हमें डॉक्टर के पास जाना चाहिए? "मैं क्या बोलूँ यार बोला नहीं जा रहा पर देख लीजिए अगर कोई अवेलबल है आस पास में तो चलिए।
"रुको मैं प्रैक्टो एप्प से चेक कर के बताता हूँ। यार एक डॉक्टर सिन्हा का क्लीनिक है पास में और वैसे कहो तो अपोलो भी जा सकते वहाँ भी कोई ना कोई मिल सकता? विल यू कम ऑन बाइक? या कैब करूँ?" "आपको क्या लगता है ? कैसे जा सकती मैं इतने फ़ीवर में? "नहीं मैं तो बस पूछ रहा था। ओके बेबी फिर कैब करें ? पर जाने में एक घंटा तो लग ही जाएगा। "आप रहने दीजिए मैं अपने फैमिली डॉक से पूछती हूँ। अगर वो कुछ सजेस्ट करते हैं तो मैं वही ले लूँगी एंड परसों सैटरडे है तो अगर ठीक नहीं हुआ कल तक फिर हॉस्पिटल चलते हैं। "हाँ बेबी सही रहेगा। यू टॉक टू हिम।
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"अतुल! अतुल....! सुन रहे हैं क्या? उफ़्फ़ कितना शोर मचा रखा है यार इस बन्दे ने।" एकदम से चिढ़ी हुई सोना ड्रॉइंग रूम में जाकर बोली "आप वॉल्यूम थोड़ा कम करेंगे टीवी का? मेरे सर में दर्द हो रहा! और आपने कुछ खाया? " या बाबू, खा लिया तुम सोई थी तो जगाया नहीं, पिज्ज़ा आर्डर किया था। तुम लोगी? अतुल बारह बज रहे हैं! एक बार आकर जगा तो देते यार मैंने चाय भी नहीं पी है अब तक ।अभी बस फ़ीवर उतरा ही है। आई नीड सम टी। और ये पिज्जा कौन खाता है फ़ीवर में?
"तो तुम चिढ क्यों रही हो भाई? एक तो तुम्हारे लिए सब छोड़ के घर पे बैठा हूँ और तुम हो कि नुक्स निकाले जा रही हो! पिज्जा नहीं खाना तो कुछ और आर्डर कर दो और मुझे क्या पता कि फ़ीवर में क्या खाते हैं?
"क्यों आप को कभी फ़ीवर नहीं हुआ क्या? और क्या फ़ायदा आपके घर पर होने से? एक हेल्प तो कर नहीं रहे।" "यार तुम बाल की खाल मत निकाला करो। तुम लेडीज लोगों का ना यही समझ में ही नहीं आता। सीधे सीधे बोला करो। अब हटो मैं चाय बना देता हूँ। पर तब तक काफी देर हो चुकी थी। एकदम से चिढ़ चुकी सोना ने कहा "आप रहने दें मैं देख लेती हूँ" सिंपल ब्रेड सैंडविच बना लेती हूँ अपने लिए। आप चाय पियेगें?
"अब नाराज हो गई क्या? "नहीं! बस अदरक वाली चाय बनानी थी इसलिए खुद जा रही हूँ।'
"हाँ ठीक है फिर तो बना लो और हाँ दो सैंडविच मेरे भी बना देना स्वीटहार्ट। " "पर आपने तो अभी पिज्जा खाया है न? "बेबी,पर तुम्हारे हाथ के सैंडविच कमाल के टेस्टी होते यार। "बस बस इतना मीठा मत डालिए कहीं शुगर ना बढ़ जाए मेरा। "गुड़ सेन्स ऑफ़ ह्यूमर डार्लिंग ... पर सच में हँसी नहीं आई।" सोना शायद बहुत कुछ कहना चाहती थी पर फिलहाल चुप रहना ही उसे बेहतर लगा ।
इधर किचन में सोना हैरान- परेशान हो रही थी और उधर अतुल भैया फोन में व्यस्त।
"हेलो माँ। कैसी हो? "अरे अतुल बेटा आज दिन में फोन किया सब ठीक है ना मैं तो घर पर ही हूँ तू कहाँ है? "माँ आज छुट्टी पर हूँ, सोना की तबियत खराब थी तो रुक गया। "अच्छा ज्यादा खराब है क्या? "हाँ माँ बुखार है शायद वायरल है! "अरे तो डॉक्टर से दिखा दे। "अरे माँ इतनी गर्मी हो रही है दिल्ली में कहाँ जाएंगे बाहर? और तबियत खराब हो जाएगी तो और वैसे भी बुखार ही है कोई सीरियस बात नहीं है। उसने अपने फैमिली डॉक्टर से पूछ लिया है।" "पर बेटा फिर तेरे घर पर रुकने का क्या फ़ायदा? अच्छा छोड़.. उसे कुछ जूस वगैरह दिया या कुछ खिलाया कि नहीं? "माँ वो अभी सो के उठी ही है चाय और सैंडविच बन रहा। "ठीक है बेटा सही से रहना और उसे कोई काम मत करने देना। नहीं माँ मैने पिज्ज़ा खाया और वो भी अब ठीक है फीवर कम हुआ है। चल फोन रखता हूँ किचन में देखूं क्या हो रहा। "ओके बेटा बाय। गॉड ब्लेस यू।' "बाय मम्मा।
"अरे तुम चाय ले आई। यू आर दी बेस्ट डार्लिंग। तुम्हें पता तुम मेरी फैमिली में बेस्ट लेडी हो।" अतुल ने सोना को अपने पास ही बिठा लिया। "क्यूँ? और लोग अच्छे नहीं हैं क्या? मुस्कुराते हुए सोना ने पूछा। "नहीं सब अच्छे हैं पर तुम परफेक्ट हो विथ नो कंडीशन। दैट्स व्हाट आई वॉन्टेड।" सोना के गाल खींचते हुए अतुल काफी खुश लहजे में बोल गया। "पर आपको पता मुझे क्या चाहिए?” "यार देखो तुम बता दिया करो ना मैं कर दूँगा। यू नो हाउ आई ऍम। मुझे समझ में नहीं आता कि क्या करना बट आई लव यू सो मच। टेल मी मैडम क्या करूँ आपके लिए? आपका सर दबा दूँ.?
"हा हा। जस्ट स्टॉप इट अतुल। कभी तो मुझे सीरियसली लिया करिए।"
"अरे साल भर से इतना सीरियसली ही तो ले रहा हूँ। देखो बस तुम्हें ही तो देखता हूँ हमेशा। बताऊँ? "नॉट अगैन हाँ।फिलहाल ज्यादा फ़्री होने की जरुरत नहीं है। मैं बेडरूम में जा रही । थोड़ा रेस्ट करती हूँ,विल फील बैटर।" अपना सैंडविच खतम करते हुए सोना बोली। "बेबी।मैं आऊँ ? यू रियली नीड सम थैरेपी .... "उफ़्फ़ यू आर इंपॉसिबल अतुल। दिनभर इतना ही सोचते रहते हैं क्या? "इट साउंड्स लाइक ऍम पॉसिबल बेबी। एंड यू नो ऍम बेस्ट।”
सोना को अतुल के मजाक पर हँसी आ गई।
"अच्छा बाबा...मुझे माफ कर दीजिए। कोई थैरेपी नहीं चाहिए मुझे आपकी।
"आर यू श्योर?
" हाँ श्योर, अपनी थैरेपी अभी अपने पास ही रखिए।
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अतुल! अतुल .....आपने साउंड कम नहीं किया क्या ? "या बेबी कम कर तो दिया अब कितना कम करूँ?
"तो आप मेरे पास आके बैठिए ना! आई एम् फीलिंग लो...! "ओके बॉस कमिंग। हाँ बताइए क्या सेवा करूँ मैडम ?भई तुम्हें पता ही नहीं तुम्हारे हसबैंड की क्वालिटीज क्या क्या हैं? "रहने दीजिए। बस बैठिए यहाँ बोर हो गयी हूँ। "नहीं नहीं लाओ मैं अभी सर दबा देता हूँ
"अब रहने दिजिए अतुल । इट्स ओके। वैस भी दर्द ठीक नहीं होगा।" "यार तुम कभी कुछ पसंद क्यों नहीं करती? हमेशा नुक्स निकालती रहती हो। "और आप कैसे करते हैं ? लगता है जैसे किसी ने जबर्दस्ती ड्यूटी में बिठा रखा हो…बी ईजी ओके॥"
"बस शुरू हो गया तुम्हारा? एक तो अपना ख़याल नहीं रखती, ऊपर से मैं छुट्टी लेकर बैठा हूँ उसकी भी कद्र नहीं। इससे तो बेहतर बाई को रख देता एक्स्ट्रा पैसे देकर और खुद ऑफिस चला जाता। तुम्हें इतना प्यार करने वाला हसबैंड मिला है उसकी कोई कीमत ही नहीं। जा के देखो लोग कैसे लापरवाह होते हैं।
"अच्छा तो एहसान कर रहे हैं आप? आपको जाना था तो चले जाते मेरे लिए जबर्दस्ती रुकना जरूरी नहीं था।"
"देखो मेरा वो मतलब नहीं था । यू नो कभी-कभी मुझे लगता है कि अ हैप्पी वूमन इज अ मिथ ओनली।"
"हाँ एंड अ लविंग हसबैंड इज ऑल्सो अ मिथ... राइट?
पर हमलोग क्यों लड़ रहे हैं यार? वैसे ही मेरा सर इतना दर्द कर रहा है । क्या हम बाद में नहीं लड़ सकते हैं ?"
"ओके सौरी बेबी। हटाओ ये सब ....लाओ मैं धीरे धीरे दबा देता हूँ।
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बेबी...। सोना... हम्म। "बेबी। सो गईं क्या?" क्या हुआ? "मैं हॉल में जाऊँ? सोचा घर पे हूँ तो मैच देख लूँ।" हम्म जाइए। "कोइ जरूरत हो तो आवाज दे देना।" "ठीक है जाइए।"
अतुल के जाते ही सोना ये सोचने लगी कि क्या वाकई अतुल इतने सीधे हैं? या वो अपनी इमेज बना रहे? या वो ऐसे ही हैं शायद समय के साथ जिम्मेदार हो जाएं? इस जमाने में जहाँ लड़के कमिटमेंट के नाम से ही भागते फिरते हैं वहाँ अतुल तो वाकई काफी जिम्मेदार लग रहे हैं। इन्हीं सब अन्तर्द्वंद के बीच खुद पर गुस्सा होते हुए सोना सोचने लगी। "बेकार ही मैं उनपर नाराज हो गयी। उनकी गलती ही क्या है उन्हें आता ही नहीं ये सब यार। जैसे तैसे उन्होंने मेरी मदद करने की जो कोशिश की है वो कहीं से भी कम नहीं है । ये सास-बहू वाले सिरियल देख-देख के मेरा दिमाग भी खराब हो गया है! घर पे हैं तो क्या हुआ अगर एक मैच देखना चाहते हैं तो । और ऐसा भी क्या ईगो रखना मैं ही उनके पास चली जाती हूँ। सोना मन में अतुल के लिए स्नेह से भरी खुद से खुश सी हॉल की तरफ जा ही रही थी कि अतुल की आवाज आई।
"हाँ भाई सतीश। कैसे हो बे? कब से लगा रहा था साले उठाते क्यों नहीं थे? दूसरे तरफ की आवाज तो पता नहीं पर अतुल की बात स्पष्ट सुनाई दे रही थी।
मैं? मैं घर पे हूँ यार। तेरी भाभी की तबियत खराब थी। हाँ हाँ काम तो था पर मेडिकल मिल गया भाई। नहीं! कोई मजनूं नहीं बन रहा यार और वैसे भी एक फ़ीवर के लिए कौन लीव लेता है बे । उसकी तबियत खराब तो थी ही फिर सोचा बाई को सारे टाइम के लिए रोक लूँ। बट याद आया अगले वीक प्रेजेंटेशन है और आज मैच भी है और वो भी इंडिया पाकिस्तान का। सोचा इसी बहाने सोना को भी देख लूँगा, मैच भी और प्रेजेंटेशन का बचा हुआ काम भी पूरा हो जाएगा। हाँ हाँ वो खुश लग रही थी । सोने गई है कमरे में। नहीं बे तुमको क्या लगता यार । सुबह से इतनी चिड़चिड़ी हो रही है कि पूछ मत। तुरत- तुरत नाराज हो जाती है। अब चाय के लिए नहीं उठाया तो उस पर नाराज। वॉल्यूम तेज तो उसपर। उसके पास जा के नहीं बैठा तो उस पर!
यार लोग बस मर्दों को ही ब्लेम करते हैं, बट फ़ैक्ट इज कि लड़कियां भी कम टार्चर नहीं करती हैं! इनके अगैन्स्ट बोला नहीं कि फ़ेमिनिस्म का झण्डा लेकर तैयार्… कौन लड़े भाई? बेसिक सेन्स होना चाहिए लड़ने के लिए भी! और तू तो जानता ही है सेन्स जैसी फ़ालतू चीज लड़कियां रखती ही कम हैं…।एक तो इनके मूड का पता नहीं चलता दुसरे इनकी डिमांड्स समझ नहीं आती… और ये लड़कियाँ कुछ ज्यादा ही वीक भी तो होती हैं । इतने फ़ीवर में हमें तो ऑफिस जाना ही पड़ता है बास! पर क्या कर सकते।
"अ हैप्पी कपल इज ए मिथ ब्रो"!
तू कितना भी कर ले यार लड़कियों को खुश नहीं कर सकता। देख वैसे मेरी सोना बहुत ही अच्छी है पर है तो लड़की ही, तो लड़कियों वाले नखरे तो होँगे ही ना भाई।
हालाँकि अतुल ने जो कहा वो उसके हिसाब से शत प्रतिशत जायज था और इसमें कोई बुराई भी नही थी। पर जाने क्यो सोना के कदम आगे बढ़ नहीं पाए और वापस मुड़ कर सोना कमरे में आ गयी।
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"हाँ माँ। हेलो ।
"हाँ बेटा कैसी है ?तबियत तो ठीक है न? बुखार उतरा तेरा? और अतुल ख़याल तो रख रहा ना ठीक से?
"हाँ ठीक हूँ माँ। अतुल घर पर ही हैं बहुत केयर कर रहे हैं आप टेंशन मत लो।
"तो तू इतनी सैड साउंड क्यों कर रही बेटा? कोई बहस हो गयी क्या दामाद जी से? "नहीं मैं सैड नहीं हूँ माँ। कितना तो करते हैं अतुल मेरे लिए। हाँ थोड़ा जल्दी परशान हो जाते हैं।"
"अरे तो उन्हें समझा बेटा कि तुझे उनकी जरुरत है सब ठीक हो जाएगा। शुरू -शुरू में लड़के थोड़ा नासमझ होते।धीरे धीरे समझ जाएँगे।
"अरे नहीं माँ वो कर रहे जितना कर सकते। और आप क्या चाहतीं ?सब छोड़ के मेरे सामने तो नहीं बैठे रह सकते? मैं ठीक हूँ कोई ख़ास दिक्कत नहीं है। पता नहीं कौन से जमाने की सोच हम लोगों पर थोपी जा रही है? कि ये काम औरतों का है और ये काम मर्दों का…इस सब में उलझ के अच्छी खासी लाईफ़ के रस्ते ही लग जाते हैं…और आपलोग ये पत्नियों को खुश करने के तरीके और पतियों के बदलने की कहानियाँ मत सुनाया करो।
इट्स हाई टाईम मम्मा,और वैसे भी आजकल की लाईफ़ में "अ हैप्पी कपल इज ए मिथ।"
Copyright : Shubhangini Chandrika

आधी प्रेमिका- the ghostly tale..

मेरी लिखी हुई एक व्यंग्य कथा...a story without offense... enjoy!!! आज सुबह शनिवार का दिन बड़े मजे से शुरू हुआ....बैंगलोर की गुलाबी ठंढक और शहर से बाहर बनी मेरी सोसाइटी ! इतना आनंद और ऐसी हरियाली कि बस मन का कवि हो या मन की प्रेमिका दोनों ही समस्त कलाओं के साथ बाहर आने को उतावले हो जाते हैं.. ऐसे मानो किसी ने समुद्र को उमड़ने का न्योता दे दिया हो... ऐसे में सुबह छह बजे मैं घूमने के लिए सोसाईटी से बाहर निकली और सामने की सुनसान सड़क पर टहलने लगी। मगर तभी एक सिहरन सी हुई और मेरे कानों में आवाज आई... श श कोई है... मैंने पलट के देखा, पर आस पास कुछ ना मिला फिर थोड़ी देर बाद मैंने वहम समझ के टाल दिया.. लेकिन कुछ और कदम चलने पर फिर आवाज आई... रुक जाओ बहन..! मैं फिर पलटी पर इस बार भी कोई नहीं था... अब तो मैं वाकई डर गयी और हनुमान चालीसा पढना शुरू कर दिया साथ ही हाँफते हांफते अपनी चाल भी तेज कर ली। ऐसा लगा मानो कोई मेरे साथ साथ ही चल रहा हो .. अंत में मैं रुक गयी और कड़कदार आवाज में पूछी "कौन है? सामने आओ" मगर इतनी सी देर में मेरे दिमाग में जी हॉरर शो से ले कर आपबीती तक की कहानियाँ घूमने लगीं और लगा कि बस थोड़ी देर में कोई चुरैल मेरे कंधे पे सवार होकर मेरी गर्दन में ऐसे दाँत चुभोएगी जैसे हम लस्सी के पैक में स्ट्रा डालते हैं! मैं इसी कशमकश में थी और ऊपर से आवाज आई... "ओये ऊपर देख ऊपर। जिन्दा इंसान ! मैं यहाँ हूँ... मैंने देखा एक जीन्स और टीशर्ट पहनी सामान्य सी लड़की ऊपर पेड़ पे बैठी है... मैंने कहा " दिमाग खराब है या बेवकूफ हो? क्यूँ डरा रही मुझे? और हो कौन तुम भाई? वो भूतनियो की तरह पेड़ से हवा में सरकती हुई नीचे आई और बोली "मैं भूतनी हूँ। उसके बाद हमारी बातचीत कुछ ऐसे हुई... मैं: "अरे मजाक बंद करो। पागल हो क्या,किस एंगल से तुम भूतनी लगती हो ?अच्छी खासी सूरत है और खुद को भूतनी बता रही हो? शर्म नहीं आती तुम्हें? और तुम मुझे क्यों परेशान कर रही? भूतनी: अबे हट, तुम साले बिहारी लोग कभी सुधरोगे नहीं। अरे कभी असली का भूत देखा है? और ये जी टीवी, सोनी वाले सब ठगते हैं बहन.. हमारे पास मेकअप नहीं होता और खून कहाँ लगायेंगे? हमारा तो शरीर ही नहीं? मैं: तुम्हें कैसे पता मैं बिहारन हूँ? और तुम्हारे कहने से मैं तुम्हें भूतनी क्यूँ मान लूँ? भूतनी कूद के मेरे कंधे पे बैठ गयी और बोली "अब मानेगी? या और बड़ा डेमो चाहिए? अब तो भाई मुझे बहुत ज्यादा डर लगने लगा । मेरे जिगर, गुर्दे, आँत, सभी शोर मचाने लगे और मैं सूखे पत्ते की तरह डर से थर थर काँपने लगी। मैंने कहा "देखो !मुझे छोड़ दो । मेरे छोटे छोटे बच्चे भी नहीं हैं। मेरा एक ही पति है। मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है । मैंने तो अभी दुनियाँ देखी भी नहीं ठीक से । मेरे हाथ पैर सुन्न पड़ने लगे और मैं जोर जोर से पढने लगी "जय हनुमान ज्ञान गुण सागर" इतने में मेरे कंधे से उतर के वो मेरे सामने खड़ी हो गयी। "अरे चुप हो जा मेरी माँ..क्यों सुबह सुबह हनुमान जी को परेशान कर रही है? और ये क्या ?हनुमान चालीसा भी गलत पढ़ रही है। पहले पढना-लिखना सीख। बड़ी आयीं, चालीसा से भूत भगाने वाली। ओ बहन जी। तेरी इन्फो के लिए बता दूँ मरने से पहले मैं भी ब्राम्हण थी वो भी बिहार की शुध्द मैथिल ब्राम्हण "साधवी झा"।और ये मन्त्र ना पढ़ा कर क्योंकि इस सब से मैं तो ना भागने वाली। मैं: "पर आप मेर पीछे क्यों लगी हैं? क्या मुझसे कोई गलती हुई है ? भूतनी: "नहीं गलती तेरी नहीं भाई मेरी ही कुछ जरूरतें हैं जो तुझे पूरी करनी पड़ेंगी। दरअसल, मैंने वो आधी girlfriend की कहानी देखी। पता लगाया कि ये तो गलत है। मैं भी तो माधव झा की बहन हूँ मेरे भाई की अंग्रेजी इतनी भी बुरी ना थी। और पता नहीं दूसरा कोई माधव झा सिमराव में है कि नहीं रे। और कौन सा बिहारी झाजी एक लड़की के पीछे विदेश जाता है भाई? खैर छोड़... सोचा लेखक के घर जा के उसे असली कहानी सुनाऊँ अपनी। और उसे समझाऊं कि असलियत में सारे लड़के-लड़की इतने वेल्ले नहीं बैठे रहते कि यही सब करते रहें... पर उसने न बड़ी बेईज्जती कर दी है बॉय गॉड बिहारियों की सो सोचा तेरे पास आ जाऊँ? तू असली कहानी लिखेगी मेरी। उधर तो मैं बाद में निपट लूँगी। और हाँ ! तू जल्दी से मेरी कहानी लिख वरना तेरा पीछा नहीं छोड़ूँगी। मैं: "अच्छा !तो आप इस माधव झा की बहन हैं?क्या हुआ आपको और आपने शरीर क्यों छोड़ा? विस्तार में बताएँगी तो ज़रा लिखने में सरलता होगी। भूतनी: अरे मैंने पता किया ऐसा कोई कहानी नहीं हुआ था। और इस लेखक की कहानी के चक्कर में जान चली गयी मेरी। मैं: वो कैसे? भगत जी तो बड़े उम्दा लेखक हैं। उनके तो सब फैन हो गए हैं । और उनकी कहानी तो बड़ी प्यारी थी उससे आपका नुकसान कैसे हुआ? भूतनी: "चल हट। एक सूरज बड़जात्या जी ने दोस्ती का कॉन्सेप्ट ला के दिमाग का दही कर ही दिया था और ऊपर से भाईजान ने बोल दिया लड़का-लड़की कभी दोस्त नहीं होते और इस डायलॉग ने कई साल तक गर्लफ्रेंड -बॉयफ्रेंड के नाम का रायता फैला दिया। और अब ये भगत जी ने उसको भी आधा कर दिया! " हॉफ गर्लफ्रेंड।" साला। अब लड़के - लड़की हॉफ गर्लफ्रेंड /बॉयफ्रेंड बोल के रिलेशनशिप इजिली तोड़ देते हैं कि लो भईया हमारा स्टेट्स मैच नहीं करता तो हॉफ बॉयफ्रेंड बनेगें। मैं: ओहो। तो आपके बॉयफ्रेंड ने आपको धोका दे दिया? भूतनी (रोते हुए): आग लगे इस हॉफ-हॉफ को! मेरा बसता घर उजाड़ दिया इस कलमुँही ने। मैंने बड़े प्रेम से ये किताब अपने बॉयफ़्रेन्ड को गिफ्ट की थी।
उसने दो महीने बाद कहा "माधवी झा" हम तुमसे प्रेम नहीं कर सकते हैं।हमारी तुम्हारी जात अलग है और इसलिये हम तुम्हारे पति नहीं बस हॉफ बॉयफ्रेंड बन सकते हैं ।" ऊ कुकुर कहानी में ऐसे खप गया कि हमारा नाम "साधवी" के बदले "माधवी" बोल गया। बस हमारा गुस्सा उबल गया और हमने वही किताब उसके सर पर दे मारी। कहा जाओ भाड़ में तुम बुर्बक। हमको हॉफ नहीं फुल चाहिए। और ज्यादा हॉफ-हॉफ बोलबो ना तो भैया को बोल देंगे ,फिर तुम्हरा सच्चे में दो ठो हॉफ कर देंगे मेरे भैया लोग।
मैं: ये तो बहुत अच्छा किया । पर फिर आप की जान कैसे गई। भूतनी(इस बार विचलित हो कर): भूत। इस रेख्ता कपूर के सीरियल के भूत ने जान ले ली हमारी। इसको भी बहुत दिन से ढूंढ रहे हैं। अकेले मिलेगी की लपक लेंगे। फिर इसके ऊपर कहानी बन जाएगी। ही ही ही ही। ( भूतनी की हंसी बड़ी डरावनी थी और डर के मारे मेरे रोंगटे खड़े हो चुके थे) मैं: कौन है ये रेख्ता? और कौन सा सीरियल ? भूतनी: अरी पगली। तुझे राईटर किसने बना दिया? समझती नहीं क्या ? नाम लेने पर उसके जिन आकर पकड़ लेंगे तुझे। समझ ना जो कहती हूँ। इस रेख्ता के सास-बहु वाले सीरियल का भूत सवार था मेरे सर पर। मैंने समझा हिरोईन जब प्यार में धोका मिलने के बाद जहर खा लेती है तो मर के भी वापस लौट जाती है क्योंकि हीरो सारी जिद छोड़ के उसकी जान बचाता है भगवान से भी लड़ लेता है। यही सोच के मैंने उसे व्हाट्सऐप काल किया और उसके सामाने जहर रख के कहा "मेरे साहिर। तुम्हारी साध्वी अब विदा हुई।" मैं: फिर? फिर क्या हुआ? क्या आपकी जान बची? भूतनी: नहीं ! वो नहीं आया और मैं मर गयी। और तभी से मेरी आत्मा भटक रही है कि काश कोई ऐसा मिले जिससे मैं अपनी प्रेम कहानी लिखवाऊं। और लोगों को समझाऊं कि प्यार मोहब्बत सारे भूत हैं, पैशन गम का बेसिक रूट है। मैं: "आई सी।तो भूतनी जी फिर आपके बॉयफ्रेंड का क्या हुआ? भूतनी: बॉयफ्रेंड नहीं हॉफ बॉयफ्रेंड बोल। मैं : ओह सौरी। आई मीन आपके हॉफ बॉयफ्रेंड। तो क्या आप उनसे मिलीं? क्या आपने उन्हें पनिश किया?और इस कहानी के लिए आप मुझ तक कैसे आयीं? भूतनी(सांस छोड़ते हुए): अरे रुक रुक मैट्रो,रुक जा। एक एक कर पूछ। ऐसे मीडिया वालों और सनसनी , तहलका की तरह सवालों की झड़ी लगा कर डरा मत। मेरा हार्ट फेल हो जाएगा। देख । तुझसे पहले मैं जी टीवी और सोनी के ऑफिस गयी थी ये हॉरर शो के राइटर्स डाइरेक्टर्स का पता लगाने। बड़ी मुश्किल से आफिस के कर्मचारियों को डरा धमका कर पता निकलवाया। मगर ये चैनल वाले बड़े तेज हैं। इन्होंने चुपके से मीडिया को इन्फॉर्म कर दिया। बाहर निकलते ही अलग अलग चैनल वालों ने मुझे घेर लिया और डराने लगे।उनके सवाल एक पर एक गोलियों की तरह पड़ते थे। एक ने पूछा "भूतनी जी,भूतनी जी।आप कैसे मरीं? क्या हुआ था आपको? क्या आप बेरोजगार थीं? क्या आपको मोहब्बत में धोका मिला ?क्या आपने आत्महत्या की थी? मैं जवाब देती उससे पहले दूसरे ने पूछा " क्या आप को दहेज़ के कारण मार दिया गया? या ऑनर किलिंग का मामला था?" तीसरा: " ध्यान से देखिए इस खूबसूरत भूतनी को।जी हाँ ये कोई आम महिला नहीं, भूतनी हैं भूतनी। जो अपने इन्साफ की लड़ाई खुद लड़ रही हैं। किस दिशा में जा रहे हैं हम कि जहाँ मरने के बाद भी इन्हें मुक्ति नहीं मिली। क्या ये नोटबंदी का असर था ? या बढ़ते अपराधों का कहर? क्या मोदी सरकार इस गरीब भूतनी को इन्साफ दे सकेगी? क्या केजरीवाल इनसे भी इनका डेथ सर्टिफिकेट मांगेंगे? आखिर कहाँ गुहार लगाएंगी ये ? यह केस कौन देखेगा? क्या केन्द्र सरकार इनको मुआवजा देगी या नॉवेल के लेखक या बिहार सरकार? अगर आप इनकी लड़ाई में हमारे साथ हैं तो हमें मेल लिखें। बस बहन, मैंने मौक़ा देख के उड़ी मार लिया, वरना तो ये लोग मुझे बहस का मुद्दा बना डालते। बस उसी डर के मारे तेरीे जैसी टुटपूंजी राईटर के पास आई हूँ कि यहाँ मीडिया ना होगी। और रही बात बॉयफ्रेंड से बदला लेने की? तो मैंने उसकी शादी करवा दी है । मैं: " अच्छा। आप वाकई महान हैं। कौन लड़की मर कर भी बेवफा बॉयफ्रेंड का घर बसातीहै?आप एक मिसाल हैं कलयुग में आप जैसे महान लोग कम ही पैदा होते होंगे। भूतनी: " ही ही ही ही।बड़ी भोली है रे राईटरनी! अरे मैंने बदला ही लिया है उससे।चल मैं समझाती हूँ। दरअसल जब पता चलता कि बन्दा लड़की देख़ने जाने वाला है तो मैंने उसको लपक लिया और जानबूझ कर उसकी किसी अच्छी लड़की से शादी होने ही नहीं दी। और अंत में एक सबसे झगड़ालू औरत को देखकर मैंने उसके मुँह से हाँ करवा दिया । अब उसकी ये बीवी भूतनी की भी नानी है। मैं तो एकबार में ही मार देती। उसकी बीवी रोज उसका 100 ml ब्लड चूस जाती है। अब बच्चू को समझ आएगा कि आधा बॉयफ्रेंड बनने की सजा क्या होती है। मैं: "वाह। आपने तो बहुत हिम्मत दिखाई। तो क्या आप अपने बॉयफ्रेंड को उसकी पत्नी के साथ देख पाती हैं? आपको जलन नहीं होती? भूतनी( इस बार दार्शनिक हो कर बोली): बहन! ये सब चोंचले ज़िंदा औरतों के होते हैं। हम ज़िंदा हों तो जलन, कुढ़न, शिकवा, शिकायत ,प्यार- मोहब्बत, दर्द और करार होता है। साला एक बार मर जाओ फिर ना शरीर ना शरीर की जरूरतें और आदतें। मैं तो चाहती हूँ कि घर बसे उसका और बच्चों की लाईन लग जाए। जब आंटे-दाल का भाव मालुम होगा ना फिर अकल ठिकाने आ जाएगी। तब ना आधा बॉयफ्रेंड रह पायेगा ना पूरा पति। अकेले होने में कोई तकलीफ ना होती बहन, जीवन की असली लड़ाई तो गृहस्ती में होती। अब तू घर जा और रोज आकर मुझसे मेरी लव स्टोरी सुनने आ जाना।जिस दिन नहीं आयी उस दिन मैं फिर तुझे लपक लूँगी। बस भइया।मैं तो भाग कर घर आ गयी। अब पाठक लोग ही बताएं क्या मैं ये प्रेमकथा लिखुँ? कॉपीराइट (C) :: Shubhangini Chandrika

पराजिता : एक रिश्ता जहाँ सब हारने से ही सफ़लता मिलती है (my short story got published on mycity4kids.com

विवाह की ग्यारहवीं वर्षगाँठ थी। सुबह उठते ही श्रुती ने दो कप चाय बनाई और विशाल के साथ बैठ कर बातें करने लगी, कुछ मन की बातें तो कुछ पुरानी यादें। और क्यों ना हो? लगभग नौ सालों बाद ऐसा हुआ कि सालगिरह किसी वीकेंड में आई हो वरना तो हमेशा कभी मीटिंग तो कभी आफिस के झमेले में दोनों ही उलझे रहते थे।बड़े प्यार से विशाल के काँधे पे हाथ रख के श्रुति ने कहा "कितने साल हो गए ना विशाल? कितना कुछ बीत गया इन दस-ग्यारह सालों में?कितने बदल गए हैं हम नहीं?"
"हाँ !और तुम तो बिल्कुल ही बदल गयी हो श्रुती। ऐसा भी क्या अहम् कि खुद का व्यक्तित्व ही बदल जाए। कितनी हँसी ख़ुशी रहती थी तुम और कितनी चंचल हुआ करती थी। जाने क्या हो गया है तुम्हें? पहले गोलू और फिर नेहा के बाद तो जैसे तुम पूरी ही बदल गयी हो। या तो बच्चों में उलझी रहती हो या कभी घर परिवार में रह कर भी अलग ही किसी दुनियां में खोई रहती हो। बहुत दिनों से ये बात करना चाह रहा था लेकिन कभी ढंग से समय नहीं मिल पाया। आज माँ -पापा भी घर पर नहीं और बच्चे भी नहीं तो सोचा पूछ ही लूँ!"
"देखो बातें पुरानी हो चुकी हैं। अब तो समय भी बीत गया। ऐसा क्या है जो मन में दबाए बैठी हो। मन को हल्का करो श्रुती।"
ऐसा कुछ नहीं है विशाल। मैं ठीक ही हूँ और समय के साथ लड़की से पत्नी, पत्नी से बहू और बहू से माँ बनने के बीच बहुत से उतार चढ़ाव आते हैं जो हमारे व्यक्तित्व को बदल देते हैं। जरूर ही ये बदलाव पुरुषों में भी आते होंगे पर जो सबसे बड़ा परिवर्तन है वो किसी नए घर में घुल मिल जाने का परिवर्तन होता है और वो बस लड़कियों के हिस्से ही आता है विशाल। इस घुलने मिलने में न जाने कहाँ-कहाँ खुद को पिघला कर नया व्यक्तित्व बनाना पड़ता है। और यही सामंजस्य है जिसके आगे सब हार जाते हैं। कल तक मेरी जो गलती तुम्हें गलती लगती थी अगर समय के साथ नेहा वैसा करे तो वो गलती नहीं रह जाएगी क्योंकि तब तुम उसे एक पिता बन कर देखोगे। लेकिन उसका पति ऐसे नहीं देख पाएगा। यही अंतर है विशाल।
याद है ना तुम्हें एक छोटी सी गलती और मेरा अस्तित्व जैसे खुरच दिया गया था। क्या दोष था तब मेरा विशाल? मैं भी बच्ची थी और तुम भी बच्चे ही थे। नासमझ थे हम दोनों गलती तो हम दोनों ने ही की थी। किसकी ज्यादा किसकी कम ये आँकना नहीं आता मुझे बस यही आता कि उस गलती ने क्या-क्या दिन ना दिखाए। कहाँ कमी रह गयी थी मेरी सेवा में? परिवार के प्रति समर्पण में। हाँ तुम से उलझ पड़ी बच्चों की तरह लड़ पड़ी ये गलती थी। शायद उतना बड़ा दिल नहीं था तब कि तुम्हें माफ़ कर देती और खुद भी माफ़ी मांग लेती।
"तो क्या हो गया श्रुती? बीत गया सब अब खुद को सामान्य कर लो, हंसो -बोलो  और खुश रहा करो । अच्छा नहीं लगता है ऐसे। और मेरे घर में किसी ने तुमसे बुरा व्यवहार तो नहीं किया ना। सब तुम्हें प्यार करते हैं। माँ को देखो वो अपने धर्म के हिसाब से सही हैं। पापा भी, दीदी भी और तुम्हारा लाड़ला देवर भी।किसी ने तुम्हारा अनादर तो नहीं किया ना? ठीक है अगर कभी किसी ने कुछ कह भी दिया हो तो उसे भूल जाओ। उस समय उनके हिसाब से वही सही था। आज देखो वही देवर तुम्हारा कितना आदर करता है वही माँ-पापा तुम्हें कितना सम्मान देते हैं। ये तुम्हारा त्याग है जो तुम्हें प्रतिष्ठा दिला रहा है।
" सही कहा आपने विशाल। त्याग ही प्रतिष्ठा दिलाता है। सबने अपनी -अपनी बात कही सबने अपनी- अपनी शिकायत की। और जहाँ तक हुआ मैंने उनकी शिकायतें दूर भी की माफ़ी भी माँगी। पर मेरा क्या विशाल? क्या मेरा भी कोई मत होगा?क्या मैं भी दुखी हुई ये किसी को याद रहा।"
एक बार गुस्से में सच कहा था आपने कि महान बनना आसान है पर महान बने रहना बहुत कठिन है।मुझे ख़ुशी है कि मैंने कोशिस तो की अपनी ओर से।
" तो तुम क्या चाहती हो बबा। बीती बातों पे अब बहस करूँ सबसे? और कोई गलत भी तो नहीं था श्रुती गलती हमारी ही तो थी।"
"Exactly! गलती हमारी थी बस उसमें से तुम बाहर निकल गए और मैं रह गयी वहीं और ये कैसी सच्चाई है ? और ये कैसा धर्म कि बस मैं ही मैं रह गई? बाँकी सब गौण हो गया!"
"साफ़ -साफ़ कहो श्रुती! कहना क्या चाहती हो।?"
"कुछ नहीं बबा। हार गयी तुमसे।" श्रुती हँसते हुए बोली…" छोड़ो ये सब पुरानी बातें। चलो आज का कुछ अच्छा प्लान बनाते हैं।कहीं बाहर चलें?"
"हाँ चलेंगे! सरप्राईज पैकेज है तुम्हारे लिए पर उससे पहले तुम अपनी बात बताओ। क्या कहना है आज कहो मैं सुनूँ तो आखिर क्या है तुम्हारे दिल में?"
"तुम ऐसे नहीं मानोगे विशाल। मुझे पता है जब तक तुम्हें संतुष्टि ना मिले तुम पूछते ही रहोगे। मैं बीती बातें याद नहीं करना चाहती आज के दिन पर तुमने पूछा है तो चलो तुम्हें एक कहानी सुनाती हूँ।
"तुम्हें द्रौपदी याद है? महाभारत की द्रौपदी? जब उन्हें राजदरबार में दासी कह कर बुलाया गया और उनका अपमान किया गया तो उन्होंने सबसे प्रश्न किया कि दरबार में बैठे सज्जन पुरुष उनकी रक्षा क्यों नहीं कर रहे? पांडवों ने कहा धर्म के हाथों बन्धे हैं। महात्मा भीष्म ने कहा मैं अपने वचन के हाथों बंधा हूँ। विदुर, द्रोण और कृपाचार्य सब ने यही कहा कि हम अपने -अपने धर्म से बँधे हैं।अंत में द्रौपदी ने एक ही वाक्य कहा कि ये कैसा धर्म है जो इतने बड़े अधर्म को सहारा दे रहा है। अगर सब धर्म में स्थित हैं तब तो मैं ही अधर्म कर रही हूँ जिसका दंड दिया जा रहा है? "
सदियों से यही होता आया है विशाल । हम कभी समझ ही नहीं पाते कि किस परिस्थिति में हमारा धर्म क्या है।खैर ये सब छोड़ो । आज बहुत अच्छा दिन है और हम दोनों पता नहीं किस बात में उलझे हुए हैं। ये क्या कम है कि हम साथ हैं खुश हैं । चलो अब दिन की शुरुआत करें । शादी की सालगिरह मुबारक हो।
विशाल हँसते हुए बोला "तुम्हें भी। चलो इसे यहीं छोड़ें और आगे बढ़ें डीयर वाईफी।"
और सही मायने में यही उनकी पहली सालगिरह थी। क्योंकि आज जहाँ ,जो जैसा था उसे वैसा ही मान लिया गया बिना किसी तर्क बिना किसी बहस के।https://www.mycity4kids.com/parenting/life-starts-to-change-when-you-start-to-accept-it/article/parajita-eka-rishta-jahan-saba-harane-se-hi-saflata-milati-hai