विवाह की ग्यारहवीं वर्षगाँठ थी। सुबह उठते ही श्रुती ने दो कप चाय बनाई और विशाल के साथ बैठ कर बातें करने लगी, कुछ मन की बातें तो कुछ पुरानी यादें। और क्यों ना हो? लगभग नौ सालों बाद ऐसा हुआ कि सालगिरह किसी वीकेंड में आई हो वरना तो हमेशा कभी मीटिंग तो कभी आफिस के झमेले में दोनों ही उलझे रहते थे।बड़े प्यार से विशाल के काँधे पे हाथ रख के श्रुति ने कहा "कितने साल हो गए ना विशाल? कितना कुछ बीत गया इन दस-ग्यारह सालों में?कितने बदल गए हैं हम नहीं?"
"हाँ !और तुम तो बिल्कुल ही बदल गयी हो श्रुती। ऐसा भी क्या अहम् कि खुद का व्यक्तित्व ही बदल जाए। कितनी हँसी ख़ुशी रहती थी तुम और कितनी चंचल हुआ करती थी। जाने क्या हो गया है तुम्हें? पहले गोलू और फिर नेहा के बाद तो जैसे तुम पूरी ही बदल गयी हो। या तो बच्चों में उलझी रहती हो या कभी घर परिवार में रह कर भी अलग ही किसी दुनियां में खोई रहती हो। बहुत दिनों से ये बात करना चाह रहा था लेकिन कभी ढंग से समय नहीं मिल पाया। आज माँ -पापा भी घर पर नहीं और बच्चे भी नहीं तो सोचा पूछ ही लूँ!"
"देखो बातें पुरानी हो चुकी हैं। अब तो समय भी बीत गया। ऐसा क्या है जो मन में दबाए बैठी हो। मन को हल्का करो श्रुती।"
ऐसा कुछ नहीं है विशाल। मैं ठीक ही हूँ और समय के साथ लड़की से पत्नी, पत्नी से बहू और बहू से माँ बनने के बीच बहुत से उतार चढ़ाव आते हैं जो हमारे व्यक्तित्व को बदल देते हैं। जरूर ही ये बदलाव पुरुषों में भी आते होंगे पर जो सबसे बड़ा परिवर्तन है वो किसी नए घर में घुल मिल जाने का परिवर्तन होता है और वो बस लड़कियों के हिस्से ही आता है विशाल। इस घुलने मिलने में न जाने कहाँ-कहाँ खुद को पिघला कर नया व्यक्तित्व बनाना पड़ता है। और यही सामंजस्य है जिसके आगे सब हार जाते हैं। कल तक मेरी जो गलती तुम्हें गलती लगती थी अगर समय के साथ नेहा वैसा करे तो वो गलती नहीं रह जाएगी क्योंकि तब तुम उसे एक पिता बन कर देखोगे। लेकिन उसका पति ऐसे नहीं देख पाएगा। यही अंतर है विशाल।
याद है ना तुम्हें एक छोटी सी गलती और मेरा अस्तित्व जैसे खुरच दिया गया था। क्या दोष था तब मेरा विशाल? मैं भी बच्ची थी और तुम भी बच्चे ही थे। नासमझ थे हम दोनों गलती तो हम दोनों ने ही की थी। किसकी ज्यादा किसकी कम ये आँकना नहीं आता मुझे बस यही आता कि उस गलती ने क्या-क्या दिन ना दिखाए। कहाँ कमी रह गयी थी मेरी सेवा में? परिवार के प्रति समर्पण में। हाँ तुम से उलझ पड़ी बच्चों की तरह लड़ पड़ी ये गलती थी। शायद उतना बड़ा दिल नहीं था तब कि तुम्हें माफ़ कर देती और खुद भी माफ़ी मांग लेती।
"तो क्या हो गया श्रुती? बीत गया सब अब खुद को सामान्य कर लो, हंसो -बोलो और खुश रहा करो । अच्छा नहीं लगता है ऐसे। और मेरे घर में किसी ने तुमसे बुरा व्यवहार तो नहीं किया ना। सब तुम्हें प्यार करते हैं। माँ को देखो वो अपने धर्म के हिसाब से सही हैं। पापा भी, दीदी भी और तुम्हारा लाड़ला देवर भी।किसी ने तुम्हारा अनादर तो नहीं किया ना? ठीक है अगर कभी किसी ने कुछ कह भी दिया हो तो उसे भूल जाओ। उस समय उनके हिसाब से वही सही था। आज देखो वही देवर तुम्हारा कितना आदर करता है वही माँ-पापा तुम्हें कितना सम्मान देते हैं। ये तुम्हारा त्याग है जो तुम्हें प्रतिष्ठा दिला रहा है।
" सही कहा आपने विशाल। त्याग ही प्रतिष्ठा दिलाता है। सबने अपनी -अपनी बात कही सबने अपनी- अपनी शिकायत की। और जहाँ तक हुआ मैंने उनकी शिकायतें दूर भी की माफ़ी भी माँगी। पर मेरा क्या विशाल? क्या मेरा भी कोई मत होगा?क्या मैं भी दुखी हुई ये किसी को याद रहा।"
एक बार गुस्से में सच कहा था आपने कि महान बनना आसान है पर महान बने रहना बहुत कठिन है।मुझे ख़ुशी है कि मैंने कोशिस तो की अपनी ओर से।
" तो तुम क्या चाहती हो बबा। बीती बातों पे अब बहस करूँ सबसे? और कोई गलत भी तो नहीं था श्रुती गलती हमारी ही तो थी।"
"Exactly! गलती हमारी थी बस उसमें से तुम बाहर निकल गए और मैं रह गयी वहीं और ये कैसी सच्चाई है ? और ये कैसा धर्म कि बस मैं ही मैं रह गई? बाँकी सब गौण हो गया!"
"साफ़ -साफ़ कहो श्रुती! कहना क्या चाहती हो।?"
"कुछ नहीं बबा। हार गयी तुमसे।" श्रुती हँसते हुए बोली…" छोड़ो ये सब पुरानी बातें। चलो आज का कुछ अच्छा प्लान बनाते हैं।कहीं बाहर चलें?"
"हाँ चलेंगे! सरप्राईज पैकेज है तुम्हारे लिए पर उससे पहले तुम अपनी बात बताओ। क्या कहना है आज कहो मैं सुनूँ तो आखिर क्या है तुम्हारे दिल में?"
"तुम ऐसे नहीं मानोगे विशाल। मुझे पता है जब तक तुम्हें संतुष्टि ना मिले तुम पूछते ही रहोगे। मैं बीती बातें याद नहीं करना चाहती आज के दिन पर तुमने पूछा है तो चलो तुम्हें एक कहानी सुनाती हूँ।
"तुम्हें द्रौपदी याद है? महाभारत की द्रौपदी? जब उन्हें राजदरबार में दासी कह कर बुलाया गया और उनका अपमान किया गया तो उन्होंने सबसे प्रश्न किया कि दरबार में बैठे सज्जन पुरुष उनकी रक्षा क्यों नहीं कर रहे? पांडवों ने कहा धर्म के हाथों बन्धे हैं। महात्मा भीष्म ने कहा मैं अपने वचन के हाथों बंधा हूँ। विदुर, द्रोण और कृपाचार्य सब ने यही कहा कि हम अपने -अपने धर्म से बँधे हैं।अंत में द्रौपदी ने एक ही वाक्य कहा कि ये कैसा धर्म है जो इतने बड़े अधर्म को सहारा दे रहा है। अगर सब धर्म में स्थित हैं तब तो मैं ही अधर्म कर रही हूँ जिसका दंड दिया जा रहा है? "
सदियों से यही होता आया है विशाल । हम कभी समझ ही नहीं पाते कि किस परिस्थिति में हमारा धर्म क्या है।खैर ये सब छोड़ो । आज बहुत अच्छा दिन है और हम दोनों पता नहीं किस बात में उलझे हुए हैं। ये क्या कम है कि हम साथ हैं खुश हैं । चलो अब दिन की शुरुआत करें । शादी की सालगिरह मुबारक हो।
विशाल हँसते हुए बोला "तुम्हें भी। चलो इसे यहीं छोड़ें और आगे बढ़ें डीयर वाईफी।"
और सही मायने में यही उनकी पहली सालगिरह थी। क्योंकि आज जहाँ ,जो जैसा था उसे वैसा ही मान लिया गया बिना किसी तर्क बिना किसी बहस के।https://www.mycity4kids.com/parenting/life-starts-to-change-when-you-start-to-accept-it/article/parajita-eka-rishta-jahan-saba-harane-se-hi-saflata-milati-hai
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